अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दी दिवस समारोह
उद्घाटन भाषण — भारत के राजदूत
बुडापेस्ट, हंगरी । 17 सितम्बर 2026
आदरणीय सभाधीश, विद्वत्पूर्ण प्राध्यापकगण, आदरणीय आचार्य-आचार्याएँ, मेरे अत्यन्त प्रिय विद्यार्थियों, हंगरी की सुधी और संस्कृति-प्रेमी जनता, तथा दूर-दूर से उपस्थित अतिथिगण — आप सभी को हिन्दी की वाणी में, हृदय की गहराई से अभिवादन — नमस्कार! और इस शानदार नगर की अपनी मधुर भाषा में भी — Jó napot kívánok!
संगीत की महान धरती, लिस्ट और बारतोक का नगर, डेन्यूब-तट पर बसा बुडापेस्ट — इस सुरम्य नगर में हिन्दी का उत्सव मनाते हुए मुझे जो आनन्द हो रहा है, उसे शब्दों में बाँधना कठिन है। आज की सभा मेरे लिए कोई साधारण कार्यक्रम नहीं — यह तो परिवार की सभा है, जिसमें भारत और हंगरी दोनों देशों के हृदय एक ही छत के नीचे बैठे हैं।
सितम्बर का मास हिन्दी के लिए पवित्र है। चौदह सितम्बर, 1949 को भारत की संविधान सभा ने एक ऐतिहासिक निर्णय लिया — देवनागरी लिपि में लिखी जाने वाली हिन्दी संघ की राजभाषा होगी। संविधान के अनुच्छेद 343 में यह विधिवत् अंकित हुआ, और तब से हर वर्ष सितम्बर में विश्व-भर में हिन्दी दिवस मनाया जाता है। परन्तु बुडापेस्ट की इस सभा के लिए यह दिवस केवल कैलेंडर की तिथि नहीं है। यह उस सत्य का उत्सव है कि भाषा समय की धूल में नहीं, हृदयों की धरती में जीवित रहती है।
हंगरी की एक अमर कहावत है — Nyelvében él a nemzet — अर्थात् राष्ट्र अपनी भाषा में जीता है। भारत की संस्कृति ने सदियों पहले यही उपदेश दिया था कि भाषा केवल संवाद का साधन नहीं — वह चित्त का दर्पण है, संस्कृति की नाड़ी है, पीढ़ियों के बीच की सेतु है। यदि राष्ट्र अपनी भाषा में जीता है, तो आज मैं गर्व से कह सकता हूँ — इस सभागार में हिन्दी जीवित है, और हंगरी की मिट्टी में उसकी जड़ें गहरी होती जा रही हैं।
हिन्दी आज किसी एक देश की सीमाओं में बँधी भाषा नहीं रही। साठ करोड़ से अधिक मनुष्य इसे बोलते और समझते हैं; विश्व की सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषाओं में हिन्दी का स्थान शीर्ष की पंक्तियों में है। विश्व की वेदियों से लेकर बाज़ारों और प्रयोगशालाओं तक हिन्दी की गूँज सुनाई देती है। हिन्दी सिनेमा और संगीत ने विदेशों में भारत का ऐसा परिचय बनाया जैसा पहले किसी दूत ने नहीं बनाया। और डिजिटल युग में इंटरनेट पर हिन्दी सामग्री सबसे तेज़ बढ़ रही है।
परन्तु हिन्दी की वास्तविक शक्ति संख्या में नहीं, उसकी व्याप्ति में है — वह एक ही पृष्ठ पर तुलसी की भक्ति, प्रेमचन्द का यथार्थ और गालिब का शेर सहजता से समेट लेती है। इसीलिए हिन्दी सीखना एक सभ्यता के कई द्वार एक साथ खोलना है।
प्रिय मित्रों, भारत और हंगरी का संबंध कूटनीतिक दस्तावेज़ों से बहुत पुराना है — यह जिज्ञासा का, ज्ञान की साझी प्यास का संबंध रहा है। उन्नीसवीं सदी में हंगरी के एक महान पुत्र ने संसार को यह सिखाया कि ज्ञान की प्यास के आगे महाद्वीपों की दूरियाँ तुच्छ हो जाती हैं। कोरोशी चोमा शांदोर — जिन्हें विद्वान ‘तिब्बत का मित्र’ कहते हैं — पैदल ही एशिया की ओर चल पड़े; वर्षों तक तपते और बर्फीले पठारों पर रहे; तिब्बती भाषा और साहित्य का पहला कोश गढ़ा; और अंततः दार्जिलिंग की धरती में शाश्वत विश्राम को प्राप्त हुए। भारत और हंगरी दोनों आज उन्हें अपना-अपना कहते हैं — और मेरा मानना है कि दोनों सही हैं, क्योंकि जो महापुरुष सत्य की खोज में निकल पड़ते हैं, वे सब देशों के हो जाते हैं।
उनके पदचिन्हों पर पीढ़ियों का काफ़िला चलता रहा। बख्ताई एरविन ने हंगरी में भारतीय कला और दर्शन के जो द्वार खोले, वे आज भी खुले हैं। वेकेर्दी योज़ेफ ने कालिदास के ‘मेघदूत’ का हंगेरियन अनुवाद किया — और मुझे विश्वास है कि कालिदास का वह मेघ आज डेन्यूब के आकाश में भी वर्षा करता है। और क्या कहूँ उस अपूर्व संगम की, जिसका नाम अमृता शेरगिल है! इसी नगर बुडापेस्ट में जन्मीं — माता हंगेरियन, पिता भारतीय — और भारत आज उन्हें अपनी राष्ट्रीय कला-निधि कहता है। अमृता के चित्रों में मुझे दो देशों का संगम नहीं, एक नई सृष्टि दिखाई देती है।
मेरे प्रिय विद्यार्थियों, इसीलिए कहता हूँ — जब आप यहाँ हिन्दी सीखते हैं, तो आप कोई नई दिशा नहीं खोल रहे; आप कोरोशी चोमा की उस प्राचीन यात्रा को — इस बार शब्दों के मार्ग से — फिर से रच रहे हैं।
हिन्दी की इस वैश्विक यात्रा को नई गति और नई गरिमा भारत के प्रधानमंत्री माननीय नरेन्द्र मोदी जी के सूदृढ़, सुदूरदर्शी नेतृत्व में मिली है। प्रधानमंत्री जी स्वयं संयुक्त राष्ट्र की वेदी से लेकर G-20 जैसे सर्वोच्च मंचों तक हिन्दी में ही संबोधित करते हैं। इसे कोई व्यक्तिगत शैली न समझे — यह एक घोषणा है कि आधुनिक विश्व में भारत अपनी माटी की वाणी में बोलेगा, और विश्व उसे श्रद्धा से सुनेगा। परिणाम सामने है — हिन्दी बोलने वालों का आत्मविश्वास और हिन्दी सीखने वालों की संख्या, दोनों इतनी ऊँची कभी नहीं थी।
इसी दृष्टि की अनुवर्ती है सरकार की सारी पहल। फरवरी 2023 में फिजी में बारहवाँ विश्व हिन्दी सम्मेलन हुआ — प्रशांत महासागर के तट पर हिन्दी की अस्मिता पर विचार हुआ। विश्व के विश्वविद्यालयों में हिन्दी की कुर्सियाँ और भारत सरकार की छात्रवृत्तियाँ हिन्दी-अध्ययन को सुलभ बना रही हैं। राष्ट्रीय शिक्षा नीति में भारतीय भाषाओं को शिक्षा के केंद्र में रखा गया है। और जो सूत्र-वाक्य भारत ने G-20 में विश्व को दिया — वसुधैव कुटुम्बकम्, अर्थात् ‘एक पृथ्वी, एक परिवार, एक भविष्य’ — उसे साकार करने वाली अंततः भाषाएँ ही हैं। भाषा के सेतु ही वे सेतु हैं जिन पर विश्व-परिवार सचमुच चलता है। इसी संकल्प के साथ भारत चाहता है कि हिन्दी प्रभुत्व की नहीं — प्रेम और जुड़ाव की भाषा बनती जाए।
और अब उस क्षण की ओर, जो आज के उत्सव का केंद्र है — मेरे अत्यन्त प्रिय विद्यार्थियों, आप। आज जो युवा-हृदय कविता-पाठ और रचनात्मक लेखन में उत्कृष्टता के लिए सम्मानित होंगे, वे केवल प्रतियोगिताओं के विजेता नहीं हैं — वे तो इस देश में हिन्दी के भविष्य के शिल्पी हैं। मैंने सुना है कि आप में से किसी को तुलसी की चौपाइयाँ रटी हैं, किसी ने प्रेमचन्द की कहानियाँ पढ़ी हैं, और किसी ने गालिब का शेर सुनकर कहा — ‘और भी हैं दिलख़ुश करने के लिए कुछ बातें’! यह जो उत्सुकता है, यही तो जीवित भाषा की सबसे सुंदर निशानी है।
मेरा आग्रह है — बोलते रहिए, चूकते रहिए, फिर बोलते रहिए। और जिस दिन आप पाएँ कि आप हिन्दी में सोचने लगे हैं — समझ लीजिए, आपने उस भाषा का हृदय जीत लिया है। हमारे मुनियों ने कहा है —
परन्तु इन विद्यार्थियों के श्रेय में एक नाम अनिवार्यतः आता है — उनके आचार्यों का। आदरणीय शिक्षक-शिक्षिकाओं, संधियाँ सरकारें करती हैं, पर दिलों की संधियाँ शिक्षक ही करते हैं। आप केवल वर्णमाला और व्याकरण नहीं पढ़ाते — आप एक सभ्यता का द्वार दूसरी सभ्यता के लिए खोलते हैं। राजदूत दूतावास की चारदीवारी में बैठकर संबंधों का प्रबंध करता है; आप कक्षा में खड़े होकर दो देशों के भावी इतिहास का निर्माण करते हैं। इस समारोह को साकार करने वाले सभी आयोजक, स्वयंसेवी और दूतावास के मेरे सहकर्मी — उन सबका मैं हृदय से अभिनंदन करता हूँ।
कबीरदास ने लिखा है —
गुरु गोविन्द दोऊ खड़े, काके लागूं पाँय ।
बलिहारी गुरु आपने, गोविन्द दियो बताय ॥
आज इस सभा के समक्ष मैं आप सबके चरणों में वही बलिहारी अर्पित करता हूँ।
आगे की राह पर दो शब्द। भारत-हंगरी के संबंध व्यापार, तकनीक, शिक्षा और पर्यटन में नई ऊँचाइयाँ छू रहे हैं; इस साझेदारी में भाषा निवेश के समान है — आज बीज बोया जाएगा, तो कल सेतु खड़े होंगे। दूतावास हिन्दी-कक्षाओं और सांस्कृतिक आदान-प्रदान को और गति देगा, और भारत सरकार की छात्रवृत्तियों पर विद्यार्थी भाषा को उसकी माटी में सीख सकते हैं। जो विद्यार्थी हिन्दी जानते हुए भारत आते हैं, उनका भारत-प्रवास साधारण पर्यटन नहीं रहता — वे संबंधियों के घर जाते हैं।
मित्रों, भाषा का विस्तार सेनाओं से नहीं — साहित्य, संगीत और मित्रता से होता है। हिन्दी का विस्तार भी प्रेम से हुआ है और प्रेम से ही होगा। कवि जाँ निसार अख्तर ने लिखा था — ‘हिन्दी है हम, वतन है हिन्दोस्तान हमारा।’ आज मैं विनम्रतापूर्वक इस पंक्ति में एक पद जोड़ना चाहता हूँ — हिन्दी अब केवल हमारी नहीं; वह उनकी भी है जो उसे अपने हृदय में बसा लेते हैं। और हंगरी की धरती, प्रिय मित्रों, निःसंदेह ऐसी ही उदार धरती है। आइए, संकल्प लें कि यह उत्सव एक दिन का नहीं, एक दिशा का बनेगा — कि आने वाले वर्षों में डेन्यूब के तट पर हिन्दी की गूँज और ऊँची होती जाएगी।
हृदय से धन्यवाद — धन्यवाद, और हंगरी की वाणी में भी — Köszönöm szépen! जय हिन्द! जय भारत-हंगरी मित्रता!